भीमा कोरेगांव हिंसा मामले की जांच करते हुए पुणे पुलिस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी मारने की साजिश हो रही ऐसा पता लगा है. इस मामले में पांच बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी पर देशभर में बवाल मच गया है.और तो और कई बुद्धिजीवी नक्सलियों की पैरवी करते रहे हैं.

अभी तक ये नक्सली देश के गांवों या फिर ऐसी जगहों पर पैर पसारते रहे हैं जहां न तो सरकारी सिस्टम की पहुंच होती है और न ही सुरक्षाबलों की. यानि ये चुपचाप शहर से दूर गांवों में या आदिवासी इलाको में अपनी जड़ें जमाते रहे हैं. दलितों-आदिवासियों की आवाज बुलंद करने और उन्हें हक दिलाने के नाम पर ये चुपचाप अपने नापाक मंसूबों को पूरा करने में जुटे हैं. इस खतरनाक सोच को विभिन्न माध्यमों से खाद-पानी भी दिया जाता रहा है.
लेकिन पिछले कुछ समय से एक नया ट्रेंड देखा जा रहा है, जो बेहद घातक है. बीते कुछ समय में पुलिस के हाथ कुछ ऐसे सबूत लगे हैं जो बताते हैं नक्सलवाद का न सिर्फ चेहरा-मोहरा बदला है, बल्कि इनका ठिकाना भी बदला है. ये अब गांवों से निकलकर शहरों में भी अपनी पैठ बना रहे हैं.

विपक्ष ने पांच बुद्धिजीवियों की गिरफ़्तारी पर सवाल उठाते हुए सरकार पर आरोप लगाए हैं. विपक्ष का दावा है कि सरकार गरीबों-आदिवासियों के लिए काम करने वालों की आवाज को दबा रही है. हालांकि विपक्ष का कहना है कि नक्सली जो हिंसा करते हैं, वो उसका समर्थन नहीं करते.

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी नक्सलवाद को देश के लिए बड़ा खतरा बताया था. अक्टूबर, 2009 में बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माना था कि देश में सबसे बड़ा खतरा नक्सली ताकतों का है और उनके खिलाफ जिस तरह की सफलता की उम्मीद थी वो नहीं मिल पाई है. उन्होंने कहा था कि खतरा अभी टला नहीं है.

मनमोहन सिंह ने तब कहा था, सेंट्रल भारत में नक्सलियों की ग्रोथ चिंता का विषय है, ये समस्या आदिवासियों के लिए सबसे ज्यादा है. नक्सलियों का मजबूत होना विकास की रफ्तार को रोक सकता है, हम विकास करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन कुछ ग्रुप या लोगों को कानून को अपने हाथ में लेने का कोई अधिकार नहीं है. इस तरह के गुटों के खिलाफ हम कठिन कार्रवाई करेंगे.

अब पांच बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी पर सवाल उठने लगा है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने तो  नोटिस जारी करके पूछ लिया कि कवियों, लेखकों, पत्रकारों की गिरफ्तारी में तय मानकों का पालन क्यों नहीं किया गया है?

ये पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी, विचारक, कवि, पत्रकार और समाज के सोचने-समझने वाले वो लोग हैं, जिनके बारे में पुणे पुलिस यही सोचती है कि ये ना सिर्फ भीमाकोरेगांव वाली हिंसा से जुड़े हैं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने की साजिश का हिस्सा भी हैं. यानी ये वो लोग हैं, जिनका टारगेट खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं.

अब इनकी गिरफ्तारी के साथ ही सोशल मीडिया पर ‘अर्बन नक्सल’ शब्द ट्रेंड करने लगा. वो ऐसे की मशहूर डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने हाल ही में एक किताब लिखी है, जिसका शीर्षक है ‘अर्बन नक्सल’. माना जा रहा कि इस किताब के शीर्षक के बाद ‘अर्बन नक्सल’ ट्रेंड कर रहा है.

इसी साल  27 मई को इस किताब का विमोचन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने किया था. इस दौरान ईरानी ने कहा था कि एक रिसर्च में पाया गया है कि दुनिया में मौजूद कम से कम 21 ऐसे संगठन हैं जो भारत में शिक्षाविदों की शक्ल में लोगों को भेजते हैं जो माओवाद का अध्ययन कर अपने देश लौट जाते हैं. वे माओवाद का समर्थन करने के साथ-साथ उनकी फंडिंग का भी ध्यान रखते हैं.  परन्तु तथ्यों की विस्तृत जानकारी नहीं दी

2017 में विवेक अग्निहोत्री ने एक आर्टिकल में अर्बन नक्सल शब्द के अर्थ और इसकी अवधारणा के बारे में बताया था. विवेक ने लिखा था कि ये देश के एक तरह से ‘अदृश्य दुश्मन’ हैं. इनमें से कई को पकड़ा जा चुका है, जबकि कुछ लोग विद्रोह फैलाने के आरोप में पुलिस के नज़रो में हैं. इन सभी में एक बात कॉमन है, जो बेहद खतरनाक है. इनमें देखा गया है कि ये सभी शहरी बुद्धिजीवी हैं या फिर कार्यकर्ता हैं. इन शहरी नक्सलियों की उपलब्धियों से एक अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये सभी सामाजिक मुद्दों के प्रति चिंतित होने का नाटक करते हैं. साथ ही युवाओं को प्रभावित करते हैं.

विवेक कहते हैं, ये कभी भी सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश नहीं करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ जनता को इकट्ठा करके विरोध प्रदर्शन के जरिये अपना या पार्टी का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं. ये लोग छात्रों को विभिन्न कॉलेजों में एडमिशन लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. साथ ही कॉलेज कैंपस में ज्यादा समय तक रहने के लिए फेल होने जैसे हथकंडे भी आजमाने को कहते हैं.

ये वो इंटेलैक्चुअल हैं बहुराष्ट्रीय एनजीओ जैसी संस्थाओं वाले नेक्सस का हिस्सा हैं. सबसे खतरनाक कि ये लोग भारत को तोड़ने वाली ताकत का हिस्सा हैं. विवेक अग्निहोत्री इससे पहले साल 2016 में ‘बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम’ फिल्म भी बना चुके हैं. इस फिल्म में भी उन्होंने अर्बन नक्सल को दिखाया था.

ये हैं वो पांच अर्बन नक्सल

1-सुधा भारद्वाज

57 साल की सुधा भारद्वाज मशहूर अर्थशास्त्री रंगनाथ भारद्वाज और कृष्णा भारद्वाज की बेटी हैं. मां कृष्णा भारद्वाज जेएनयू के अर्थशास्त्र विभाग की डीन थीं और जेएनयू का प्रतिष्ठित कृष्णा मेमोरियल लेक्चर उन्हीं के नाम पर चलता है. सुधा गणित में आईआईटी कानपुर की टॉपर रही हैं और कानून की पढ़ाई करके 30 साल से छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ रही हैं. इसीलिए छत्तीसगढ़ में सुधा भारद्वाज के पक्ष में लोग खड़े हो गए.

2-गौतम नवलखा

दूसरा नाम 65 साल के गौतम नवलखा का है, जो देश की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के पूर्व संपादक हैं और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर दमन के खिलाफ मुखर आवाज हैं. गौतम पीपुल्स यूनियन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट से भी संबद्ध हैं.

3-वेरनोन गोन्जाल्विस

तीसरा नाम 60 साल के वेरनोन गोन्जाल्विस का है जो अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं, जिनके खिलाफ महाराष्ट्र पुलिस ने 2007 से कुल 17 मामले दर्ज किए, जिनमें 16 मामलों में बाइज्जत बरी हो गए. आर्म्स एक्ट में नागपुर कोर्ट ने उन्हें सजा सुनाई थी. विदर्भ के किसानों और मुंबई की झुग्गियों के बीच इनका कामकाज चलता है.

4-पी वरवरा राव

चौथा नाम 78 साल के पी वरवरा राव का है जो तेलुगू के मशहूर जनकवि हैं और आंध्र-तेलंगाना के किसानों में बेहद लोकप्रिय भी. इनकी किताबों का 20 भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. राव माओवादियों और सरकार के बीच वार्ताकार भी रहे हैं.

5-अरुण फरेरा

पांचवां नाम 48 साल के अरुण फरेरा का है जिन्होंने मुंबई के मशहूर सेंटजेवियर्स कॉलेज से पढाई की है. पेशे से वकील फरेरा के खिलाफ 2007 में महाराष्ट्र पुलिस ने 10 केस दर्ज किए और इन सभी में वो बाइज्जत बरी हो गए. 2011 में चार साल की कैद के बाद निकलते हुए फिर गिरफ्तार हुए. तब पुलिस ने आरोप लगाया वो फरार थे.

गिरफ़्तारी की बाद का पूरा वाक्या-

मंगलवार को ये पांचों लोग गिरफ्तार किए गए, लेकिन बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने पुणे पुलिस को जमकर फटकार लगाई. तीन सदस्यों वाली खंडपीठ ने सभी आरोपियों को 5 सितंबर तक सिर्फ हाउस अरेस्ट रखने का आदेश सुनाया.  अब इस मामले में 6 सितंबर को सुनवाई होगी. यानी पुणे पुलिस अब उनको ट्रांजिट रिमांड पर पुणे नहीं ले जा पाएगी, जैसा चाहती थी.

दूसरी तरफ मंगलवार तक महाराष्ट्र सरकार से अदालत ने जवाब मांगा है कि ये पूरा मामला है क्या और इसमें सबूत क्या है. इस पर अदालत में मुंह की खाने वाली पुणे पुलिस कह रही है कि सबूत देंगे. हमारे पास बहुत सबूत हैं.

हलाकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश के नाम पर शहरी नक्सली बताकर जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया, उनके पक्ष में सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक विरोध की लामबंदी तेज हो गई है. इंसाफ की वो आवाज उठी, जिसने पुणे पुलिस की हेकड़ी गुम कर दी. सुप्रीम कोर्ट में देश की शख्सियतें पहुंचीं ये गुहार लेकर कि शहरी माओवाद के नाम पर अभिव्यक्ति का गला घोंटा जा रहा है.

इन पांच लोगों की गिरफ्तारी के विरोध में कई बुद्धिजीवी आगे आए हैं. इनमें 86 साल की महान इतिहासकार रोमिला थापर, 85 साल की महान अर्थशास्त्री देवकी जैन, 73 साल के मशहूर अर्थास्त्री प्रभात पटनायक, दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सतीश देशपांडे, मशहूर कानूनविद मजा दारुवाला समेत कई और लोग हैं.

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