राफेल डील पर काफी समय से चल रही सियासती गर्मी के बाद धीरे धीरे अब सच से पर्दा उठ रहा है. काफी कोशिशों के बाद अब हाल ही में सच सामने आया है . विपक्ष का आरोप था कि 37 राफेल विमानों की खरीद के लिए  8.6 बिलियन डॉलर के सौदे की डील में गड़बड़ी हुई.  फ्रांस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में राफेल सौदे की घोषणा की थी. कई महीने से विपक्षी कांग्रेस  मोदी सरकार पर गलत ढंग से राफेल डील करने और अनिल अंबानी को फायदा करने की बात उठाकर हमला बोलती रही है

सच यह है की यह डील व्यक्तिगत बातचीत के दौरान फाइनल हुई, जिसमें  क्रॉनी कैपिटलिज्म का खेल हुआ और अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने की कोशिश हुई. दावा है कि मोदी सरकार ने प्लेन खरीद में न केवल अधिक भुगतान की व्यवस्था की बल्कि डील में पारदर्शिता भी नहीं रही.

उधर सरकार इन आरोपों पर पलटवार करते हुए कह रही है कि कांग्रेस बिना किसी सुबूत के आरोप लगा रही है. सरकार बता रही है कि राफेल डील तो यूपीए सरकार के वक्त ही शुरु हुई.

 News, Latest news, breaking news, current news, world news, Hindi newsतभी पिछले हफ्ते विपक्षी कांग्रेस के हाथ बड़ा हथियार लगा, जब पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का एक बयान सामने आया, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति ने कहा था कि भारत सरकार के प्रस्ताव पर ही रिलायंस को पार्टनर बनाया गया, इसके अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं था. हालांकि एक दिन बाद उन्होंने कहा, “यह डसॉल्ट से पूछा जाना चाहिए क्या उस पर ऑफेसट पार्टनर के रूप में रिलायंस को पार्टनर बनाने का दबाव था.”

सवाल यह उठता है की दुनिया में रक्षा निर्माण क्षेत्र की प्रमुख कंपनी  दसॉल्ट ने राफेल डील में आखिर अनिल अंबानी की कंपनी को क्यों चुना, वो भी तब जब इस कंपनी की माली हालत अच्छी नहीं रही?

 News, Latest news, breaking news, current news, world news, Hindi newsअनिल अंबानी की फर्म को इसलिए चुना,  क्योंकि यह मिनिस्ट्री ऑफ कारपोरेट अफेयर्स में रजिस्टर्ड है, साथ ही नागपुर में जमीन है, जिससे रनवे की सुविधा भी मिलेगी.

कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक दसॉल्ट को कुल कीमत का 50 प्रतिशत यानी 30 हजार करोड़ रुपये का निवेश रक्षा क्षेत्र में करना होगा. उधर, दसॉल्ट ने जोर देकर कहा है कि वह अनिल अंबानी को चुनने को लेकर कतई प्रभावित नहीं था. परन्तु जब बड़े भाई मुकेश अंबानी से रिलायंस की डिफेंस कंपनी की बागडोर अनिल अंबानी के हाथ में आ गई तो फिर डसॉल्ट से बातचीत शुरू हुई थी.

पूरा मामला यह है कि वर्ष 2015 में बेंगलुरु में आयोजित हुए एयर शो के दौरान दसॉल्ट और अनिल अंबानी की कंपनी के बीच संयुक्त उद्यम(ज्वाइंट वेंचर) की योजना बनी. खास बात है कि इसके दो महीने बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से राफेल सौदे की घोषणा होनी थी. यूं तो  मनमोहन सरकार में यह  राफेल डील शुरू हुई और तब सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एचएएल इसमें मजबूत भूमिका में रही. कुल 108 विमानों के निर्माण के लिए एचएएल की भूमिका तय की गई. उस वक्त मुकेश अंबानी की फर्म भी पार्टनर थी, मगर मुकेश अंबानी की फर्म की भूमिका पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी.

दसॉल्ट सूत्रों के मुताबिक 2012 से  मुकेश अंबानी की फर्म से बातचीत शुरू हुई, बाद में उनके छोटे भाई अनिल अंबानी के हाथ कंपनी आ गई.

 News, Latest news, breaking news, current news, world news, Hindi news39 राफेल विमानों की खरीद से ठीक 17 दिन पहले राफेल की मूल कंपनी दसॉल्ट के बॉस का एक बयान भी सामने आया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह एचएएल के साथ पार्टनरशिप करने की तैयारी में हैं. दसॉल्ट के चेयरमैन एरिक ट्रैपियर (Eric Trappier) का संबंधित वीडियो कांग्रेस सोशल मीडिया पर जारी कर चुकी है जिसके जरिए कांग्रेस ने मोदी सरकार पर एचएएल को किनारे कर अनिल अंबानी का डील में पक्ष लेने का आरोप लगाया. बहरहाल, तर्क यह भी सुनने को मिलता हैं  कि एचएएल ने खुद को रेस से बाहर कर लिया क्योंकि विमानों के निर्माण के लिए आवश्यक समय और मानव संसाधन की आवश्यकता अधिक थी.

For all types of News, Latest News, current news and Breaking News, from the world of Politics stay tuned to blogs.netaaji.com and also bookmark this page for instant news.